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बाबा साहब डॉ.भीमराव अम्बेडकर और बौद्ध धर्म से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न

प्र.1- विश्व का सबसे वैज्ञानिक, तार्किक  धर्म कौन सा है  ? उ.- बौद्ध धर्म प्र.2- बौद्ध धर्म की शुरुआत किसने की  ? उ.- तथागत बुद्ध ने प्र.3- तथागत बुद्ध के माता-पिता का नाम क्या था  ? उ.- महामाया और शुद्धोधन प्र.4- तथागत बुद्ध के बचपन का नाम क्या था  ? उ.- सिद्धार्थ प्र.5. सिद्धार्थ किस राज्य के राजकुमार थे  ? उ.- कपिलवस्तु प्र.6. सिद्धार्थ किस वंश से संबंधित थे  ? उ.- शाक्य वंश प्र.7- तथागत बुद्ध का जन्म कब हुआ था  ? उ.- 563 ई.पू. प्र.8- राजकुमार सिद्धार्थ का विवाह किससे हुआ  ? उ.-यशोधरा से प्र.9- सिद्धार्थ-यशोधरा के पुत्र का नाम क्या था  ? उ.- राहुल प्र.10- सिद्धार्थ द्वारा गृहत्याग का मूल कारण क्या था  ? उ.- शाक्य-कोलिय वंश के बीच युद्ध को टालना प्र.11- सिद्धार्थ द्वारा गृह त्याग के समय आयु कितनी थी  ? उ.- 29 वर्ष प्र.12. सिद्धार्थ को राज्य सीमा से बाहर छोड़कर आने वाला नौकर का नाम क्या था  ? उ.- छन्न प्र.13. गृह त्याग के बाद सिद्धार्थ ने क्या निश्चय किया  ? उ.- ज्ञान प्राप्ति का प्र.14- सिद्धार्थ ने ब्राह्मण सन्यासियों का साथ क्यों ...

सभी ओबीसी भाई ध्यान दें और समझें और जरूर सभी पढ़ें

सभी ओबीसी भाई ध्यान दें और समझें और जरूर सभी पढ़ें जो ओबीसी, एससी, एसटी का बहुजन समाज के लोग इस घमंड मे जी रहे हैं कि हमारी आबादी ज्यादा है, और इसे कोई नही मिटा सकता। मैं उन्हें ये कहना चाहूँगा की सिर्फ दो मिनट का समय निकाल कर मेरे इस पोस्ट को पढ़ें, और इसको अपनी आम ज़िन्दगी में अमल करें। आखिर न्यायालय से ओबीसी क्यों मिट गया ? "संविधान " जो बाबा साहब अंबेडकर ने अपने बहुजनो के लिए बनाया आज उसकी हिफाजत के लिए आज वहाँ एक भी"बहुजन" नहीं बचा l "आरक्षण " जिसका विवरण संविधान में है, जहां पर राज बहुजन समाज का होना चाहिए आज उन जगहो को प्राइवेट कंपनियो को बेचा जा चुका है, और वहाँ आज एक भी बहुजन नहीं बचा l "सचिवालय " जहां डा लोहिया ने ओबीसी, एससी, एसटी के हकदारी के लिए जी जान लगा दी आज वॅहा एक भी सचिव"ओबीसी, एससी, एसटी" नही है। "खेती मे " में 40 साल पहले तक 90% लोग करना चाहते थे, आज सिर्फ 10% बचे हैं l क्यों कि खेती पर निर्भर रहने वाली बड़ी आबादी ओबीसी वर्ग था!! "मिडिया जगत " में जातिवाद का हालत यह है कि ओबीसी- एससी- एसटी क...

6 दिसम्बर एक दर्द भरी कहानी

बाबासाहब के अनुयाई हो तो इस पोस्ट को जरुर पढ़े ।?आँसु जरूर बह जायेगा!!! 6 दिसम्बर 1956 बाबासाहब भीमराव अंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस ।। जय भीम जयभीम जयभीम राजधानी दिल्ली रात के 12 बजे थे! रात का सन्नाटा और अचानक दिल्ली, मुम्बई, नागपुर मे चारो और फोन की घंटीया बज उठी! राजभवन मौन था, संसद मौन थी, राष्ट्रपती भवन मौन था, हर कोई कस्म कस्म मे था! शायद कोई बडा हादसा हुआ था, या किसी बड़े हादसे या आपदा से कम नही था!!! कोई अचानक हमें छोडकर चला गया था! जिसके जाने से करोडो लोग दुःख भरे आँसुओं से विलाप कर रहे थे, देखते ही देखते मुम्बई की सारे सड़के भीड से भर गयी पैर रखने की भी जगह नही बची थी मुम्बई की सड़को पर क्योंकि पार्थिव शरीर मुम्बई लाया जाना था! और अंतिम संस्कार भी मुम्बई मे ही होना था!!! नागपुर, कानपुर, दिल्ली, चेन्नाई, मद्रास, बेंगलौर, पुणे, नाशीक और पुरे देश से मुम्बई आने वाली रैलगाडीयो और बसो मे बैठने को जगह नही थी! सब जल्द से जल्द मुम्बई पहोंचना चाहते थे और देखते ही देखते अरब सागर वाली मुम्बई जनसागर से भर गयी!!! कौन था ये शख्स??? जिसके अंतिम दर्शन की लालसा  मे जन...

भारतीय संविधान के प्रमुख अनुच्छेद

Indian Constitution Articles(प्रमुख अनुच्छेद) *अनुच्छेद 1* :- संघ का नाम औ राज्य क्षेत्र *अनुच्छेद 2* :- नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना *अनुच्छेद 3* :- राज्य का निर्माण तथा सीमाओं या नामों मे परिवर्तन *अनुच्छेद 4* :- पहली अनुसूचित व चौथी अनुसूची के संशोधन तथा दो और तीन के अधिन बनाई गई विधियां *अच्नुछेद 5* :- संविधान के प्रारं पर नागरिकता *अनुच्छेद 6*   :- भारत आने वाले व्यक्तियों को नागरिकता *अनुच्छेद 7*   :-पाकिस्तान जाने वालों को नागरिकता *अनुच्छेद 8*   :- भारत के बाहर रहने वाले व्यक्तियों का नागरिकता *अनुच्छेद 9*   :- विदेशी राज्य की नागरिकता लेने पर भारत का                      नागरिक ना होना *अनुच्छेद 10* :- नागरिकता क अधिकारों का बना रहना                    * *अनुच्छेद 11* :- संसद द्वारा नागरिकता के लिए कानून का विनियमन *अनुच्छेद 12* :- राज्य की परिभाषा *अनुच्छेद 13* :- मूल अधिकारों को असंगत या अल्पीकरण करने वाली विधियां *अनुच्छेद 14* :- विधि के समक्ष समानता *अनुच्छेद 15* :- धर्म जाति लिंग पर भेद का प्रतिशेध  *अनुच्छेद 16* :- लोक नियोजन में अव...

आरक्षण किसलिये दिया गया...

SK BHARTI पहली बात तो ये जान लें कि ये आरक्षण नहीं बल्कि , वर्षों से छुआछूत के नाम पर उत्पीडित हुए लोगों को राजनितिक, सामाजिक आर्थिक समानता के लिए प्रतिनिधित्व था। ये बिल्कुल वैसे ही था जैसे आजकल बसों , ट्रेनों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित है। उनको सीट का आरक्षण गरीबी के कारण नहीं बल्कि कमजोर वर्ग होने के कारण दिया गया है और यही प्रतिनिधित्व है तथा यही प्रतिनिधित्व वर्षों से शोषित समाज को छुआछूत के कारण दिया गया है। अब कुछ चालाक लोग इसे आर्थिक क्रिमिलेयर से जोड़ रहें हैं, क्या क्रिमिलेयर वाले व्यक्ति के साथ जातिगत भेदभाव खत्म हो गया है...आप हम लोगों में से कई लोग क्रिमीलेयर में होंगे, वही बेहतर बता पायेंगे के क्या जातिवाद शोषण हिंसा खत्म हो गई है, मुझे नहीं लगता के कुछ बदला है। ऐसा लगता है के अब घृणा और बढ़ गई है, अब तो हमारे अच्छे घरों पहनावे को देख कर लोग किसी और तरीके से खुन्नस निकालने की कोशिश करते हैं, कयुं... कयुंकि कल तक जिन लोगों को ये पैरों की जूती के नीचे रखते थे वो अब सीना चौड़ा कर के घुमते हैं,  फिर भी आपको लगता है के सब कुछ बदल गया है, सब एक दूसरे से र...

तू कितनी हसीन है ऐ...

तू कितनी हसीन है ऐ नौकरी, सारे युवा आज तुझपे ही मरते हैं। सुख चैन खोकर चटाई पे सोकर, सारी रात जागकर पन्ने पलटते हैं। दिन में तहरी और रातों को मैगी, कुछ भी खा पीकर तेरा नाम जपते हैं। सारे युवा आज तुझपे ही मरते हैं। शहर में छोटा सा सस्ता रूम लेकर, किचन बेडरूम सब उसी में सहेज के, चाहत में तेरी ऐ सुंदर हसीना, तू क्या जाने कितने के बाल झड़ते हैं, सारे युवा आज तुझपे ही मरते हैं। रासन की गठरी को सर पे उठाये, अपनी मायूसी खुद से ही छिपाये, खचाखच भरे रेलगाडी के डिब्बे में, देश के युवा बेटिकट सफ़र करते हैं, सारे युवा आज तुझपे ही मरते हैं। इंटरनेट अखबारों में तुझको तलाशते, तेरे लिये पत्र पत्रिकाएं खंगालते, तीस बत्तीस साल तक के नौजवान, तेरे खातिर आज भी कुंवारे फिरते हैं, तू कितनी हसीन है ऐ नौकरी, सारे युवा आज तुझपे ही मरते।। santoshktn.blogspot.com by SK BHARTI

रक्षा बंधन पर कुछ सुन्दर पंक्तियाँ

आहत न होना मैं दिल की खोल रहा हूँ । जय भीम दीदी मैं तेरा भाई बोल रहा हूँ । तेरा घर है तू सौ नहीं हज़ार बार आना । पर राखी बाँधने तू कल मत आना। ढोंग पाखन्ड से मुँह मोड़ चुका हूँ । ब्राह्मण वादी परम्पराओं से नाता तोड़ चुका हूँ । सरफरोसी जज्बा कौमी आदी हो गया है। तेरा भाई पक्का अम्बेडकर वादी हो गया है । तेरी रक्षा सुरक्षा से मुझे ऐतराज़ नही है । मगर मेरा फर्ज किसी राखी का मोहताज नही है। दुख दर्द पीर भारत की नारी का ले गये । बाबा साहब तो बिन राखी के सारे अधिकार दे गये। बिगड़ा हुआ कल था वो आज बना दिया है। बाबा साहब ने नारी को सरताज बना दिया है । मेरा साथ दे और तू भी अपना रुख मोड़ ले । दूज दिवाली होली मनाना तू भी छोड़ दे । नाराज न होना बहन मेरी परसों खुद लेने आऊंगा । प्रीत रीत और फर्ज अर्ज राखी बिन सभी निभाऊंगा। ( जय भीम ) Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

रक्षा बंधन पर सुन्दर पंक्तियाँ

आहत न होना मैं दिल की खोल रहा हूँ । जय भीम दीदी मैं तेरा भाई बोल रहा हूँ । तेरा घर है तू सौ नहीं हज़ार बार आना । पर राखी बाँधने तू कल मत आना। ढोंग पाखन्ड से मुँह मोड़ चुका हूँ । ब्राह्मण वादी परम्पराओं से नाता तोड़ चुका हूँ । सरफरोसी जज्बा कौमी आदी हो गया है। तेरा भाई पक्का अम्बेडकर वादी हो गया है । तेरी रक्षा सुरक्षा से मुझे ऐतराज़ नही है । मगर मेरा फर्ज किसी राखी का मोहताज नही है। दुख दर्द पीर भारत की नारी का ले गये । बाबा साहब तो बिन राखी के सारे अधिकार दे गये। बिगड़ा हुआ कल था वो आज बना दिया है। बाबा साहब ने नारी को सरताज बना दिया है । मेरा साथ दे और तू भी अपना रुख मोड़ ले । दूज दिवाली होली मनाना तू भी छोड़ दे । नाराज न होना बहन मेरी परसों खुद लेने आऊंगा । प्रीत रीत और फर्ज अर्ज राखी बिन सभी निभाऊंगा। ( जय भीम ) Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

एक भैंस की आत्मव्यथा...

बोली भैंस गाय से बहना, मुझको भी कुछ सिखलाओ। क्यों माता माता बोलें नर तुमको, मुझको भी बतलाओ।। जाति धर्म में पड़कर , जो निशदिन लड़ते रहते हैं। निज मां का सम्मान नहीं,पर तुमको माता कहते हैं।। खेल कौन खेला है तुमने, वशीभूत किया है कैसे। मदिरा के शौकीन पुरुषो ने, तेरा मूत्र पिया है कैसे।। मेरी समझ से बाहर है सब, कुछ तो मुझको बतलाओ। कौन सियासत खेली तुमने, आज मुझे भी समझाओ।। जो गुण तुझमें वो गुण मुझमें, फिर क्यों मेरा सम्मान नहीं। दूध,दही,घी,चमड़ा सबकुछ, दिया मैने क्या सामान नहीं।। तेरी हरदम पूजा होती, फल फूल चढ़ाए जाते हैं। वेद पुराण आदि में, तेरे ही किस्से क्यों पाये जाते हैं।। तेरे मरने पर भी शहरों में, क्यों कोहराम मचाते हैं। मेरे मरने पर तो मुझको चील और कौवे ही खाते हैं।। सारी बुद्धि खोल दी मैंने पर समझ नहीं कुछ आया है। दूध दिया तुझसे ज्यादा, फिर भी आगे तुझको पाया है।। #- बोली गाय प्रेम से , फिर सुन लो बहना भैंस कुमारी। तुमसे कैसी राजनीति, तुम तो हो प्रिय बहन हमारी।। नवजात बच्चियों को जो पैदा होते ही मार गिराते हैं। दहेज की खातिर गृह लक्ष्मी को जिंदा...

डॉ० एपीजे अब्दुल कलाम साहब की चन्द लाईनें...

डॉ० एपीजे अब्दुल कलाम की चन्द लाईनें जो हमे जीवन में हमेशा याद रखनी चाहिए। और हो सके तो उसे अमल भी करना चाहिये। 1. जिदंगी मे कभी भी किसी को       बेकार मत समझना,क्योक़ि         बंद पडी घडी भी दिन में           दो बार सही समय बताती है। 2. किसी की बुराई तलाश करने       वाले इंसान की मिसाल उस        मक्खी की तरह है जो सारे          खूबसूरत जिस्म को छोडकर            केवल जख्म पर ही बैठती है। 3. टूट जाता है गरीबी मे       वो रिश्ता जो खास होता है,         हजारो यार बनते है           जब पैसा पास होता है। 4. मुस्करा कर देखो तो       सारा जहाॅ रंगीन है,         वर्ना भीगी पलको           से तो आईना भी              धुधंला नजर आता है। 5..जल्द मिलने वाली चीजे       ज्यादा दिन तक नही चलती,         और जो चीजे ज्यादा            दिन तक चलती है              वो जल्दी नही मिलती। 6. बुरे दिनो का एक       अच्छा फायदा          अच्छे-अच्छे दोस्त             परखे जाते है। 7. बीमारी खरगोश की तरह       आती है और कछुए की तरह         जाती है;          ...

मेरे बाबा साहेब कहते हैं...

S.K. BHARTI सुन ऐ नादाँ, मुझे भी कोई दौलत की कमी नही होती, अगर मुझको तेरे सम्मान की कोई फिकर नही होती! गगन को चूम रहा होता, मेरा भी ऊंचा सा बंगला, लड़ाई जो तेरे हकों की, मैने कभी लड़ी नही होती। जिये होती मेरी भी औलादें, ऐश और आराम की जिंदगी, तुम्हारें बच्चो की खुशियों की मैंने, कहानी जो लिखी नही होती! छपी होती मेरी भी तस्वीरें, कागजों के इन टुकड़ो पर, तेरी खातिर जो मनुवादियों से, दुश्मनी मैने करी नही होती! जहां चाहत थी आज़ादी की, बही नदियों से खून की धारा, कद्र होती आजादी की तुझे, जो बैठे-बैठे न मिली होती! बड़ा अफसोस है कि मेरा, रह गया अधूरा इक सपना, जो तुम मेरी औलादों ने मिलकर, मेरे बताये रास्ते पे चले होते! बाबा साहेब जी ने अंत में बस यही कहा था-शिक्षित बनों, संगठित रहों, संघर्ष करों ! अफ़सोस ये है कि आज हम शिक्षित तो बन गए, लेकिन संगठित नही हो सकें !                                "जय भीम" Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

धरती की सुलगती छाती के बैचेन शरारे पूछते हैं ...

धरती की सुलगती छाती के, बैचेन शरारे पूछते हैं ... तुम लोग जिन्हे अपना न सके, वो खून के धारे पूछते हैं... सड़कों की जुबान चिल्लाती है सागर के किनारे पूछते हैं - ये किसका लहू है कौन मरा ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. ये  जलते हुए घर किसके हैं ये कटते हुए तन किसके है, तकसीम  के अंधे तूफ़ान में लुटते हुए गुलशन किसके हैं, बदबख्त फिजायें किसकी हैं बरबाद नशेमन किसके हैं, कुछ हम भी सुने, हमको भी सुना. ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. किस काम के हैं ये दीन धरम जो शर्म के दामन चाक करें, किस तरह के हैं ये देश भगत जो बसते घरों  को खाक करें, ये रूहें कैसी रूहें हैं जो धरती को नापाक करें, आँखे तो उठा, नज़रें तो मिला. ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. जिस राम के नाम पे खून बहे उस राम की इज्जत क्या होगी, जिस दीन के हाथों लाज लूटे उस दीन की कीमत क्या होगी, इन्सान की इस जिल्लत से परे शैतान की जिल्लत क्या होगी, ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. Santoshktn.blogger.com By ...

अंग्रेजों को बुरा क्यों कहते हो साहेब❓

नासमझ लोग अंग्रेजों को बहुत गलत बताते हैं और अंग्रेजों को बहुत बुरा भला कहते हैं। लेकिन *obc* समाज में जन्मे *महान क्रन्तिकारी समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फूले* ने कहा था कि *अंग्रेज शूद्र/अतिशूद्र के लिए भगवान बनकर आये है.* अर्थात sc/st/obc/minority के *असली दुश्मन* अंग्रेज नहीं *ब्राह्मण हैं* जिन्होंने इनको शिक्षा सत्ता सम्पत्ति सम्मान से दूर रखकर *हजारो साल से शोषण किया है |* अतः शुद्रो को ब्राह्मणों की धार्मिक गुलामी से मुक्ति चाहिए तो *ब्राह्मणों द्वारा थोपे गए मान्यता परम्परा और संस्कारो को नकारना होगा ।* मैं कुछ जानकारी देना चाहता हूं जरूर पढें कि *अंग्रेजों ने कितने पाखंडों पर रोक लगाने में कामयाबी पायी...* इसे पढें - १) *रथयात्रा* :- जगन्नाथ में हर तीसरेवर्ष यह यात्रा निकाली जाती है जिसमें स्वर्ग पाने के चक्कर में रथ के पहिये के नीचे आकर सैकडों लोगों की जान चली जाती थी, कानून बनाकर बंद की । २) *काशीकरबट* :- काशी धाम में ईश्वर प्राप्ति हेतु विश्वेश्वर के मंदिर के पास कुए में कूद कर जान देते थे बंद कराई गयी । ३) *चरक पूजा* :- काली के मोक्षाभिलाषी उपासक की रीड की हड्...

बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का, कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का।। एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है, अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है।। जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो, चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो।। हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो, गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो।। हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में, हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में।। हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं, डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं।। जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं, तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायें।। गेबागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे, अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की, परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था।। भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था, अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर।। कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर, अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर।। शोक...

आज भी मैं एक बच्चा हूँ

आज भी मैं एक बच्चा हूँ, आज भी मैं छुप के रोता हूँ, आज भी मैं कभी कभी डरता हूँ, आज भी वो लम्हे याद आते, सिकुड़ के सोना,बेबाक बोलना, किसी को सोचना,कभी कुछ न बोलना, वो यारो से मिलना,बेमतलब झगड़ना, वो खुद से बातें,वो बेपरवाह रातें, कल एक मेला था,आज एक भीड़ है, कल एक दौर था,आज एक दौड़ है, कल मैं मैं था,आज मैं बस नाम हूँ, लोग कहते हैं समझदार बनो, कुछ सोचो,कुछ समझो,बड़ी बात करो,कुछ ख्वाहिशें भी हैं,थोड़ा शोर भी है, कभी रुकना भी है,कहीं मज़िल भी है, पर आज भी एक मासूमियत है, पर आज भी एक शरारत है, Iशायद आज भी मैं एक बच्चा हूँ ........ Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

*बुद्ध पूर्णिमा पर्व और सयुक्त राष्ट्र संघ*

संयुक्त राष्ट्र संघ का संदेश है कि समाज को बांटने पर केंद्रित नफरत संबंधी बयानों और हिंसक संघर्षों के वर्तमान दौर में बुद्ध की शिक्षा करुणा और अहिंसा अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बड़ी चुनौतियों से निबटने में मदद करती है। संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि भगवान बुद्ध की शिक्षा का प्रबल आधार   'विवेक" है जिससे अपने परिवार के साथ समाज को जोड़ने का सौभाग्य मिलता है यह सामूहिक जीवनपार्जन नीति है,।अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय चुनौतियों को  निबटने में बुद्ध की शिक्षा जितनी प्राचीन काल में प्रासंगीक थी, आज भी उत-निहि प्रासंगिक है।  बुद्ध कि शिक्षा सभी जीवों के लिए प्यार और करुणा का पाठ पढ़ाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने संदेश में आगे यह भी कहा है कि समस्याओं का समाधान "बौद्ध विवेक एक प्रबल स्त्रोत है" जो  'आंतरराष्ट्रीय वैशाख बुद्ध पूर्णिमा दिवस' है और यह दिवस सभी लोगों के प्रति करूणा अपनाने की याद दिलाता है जिसमें विभिन्न वर्गो में कट्टरता अस्वीकार करके सभी लोगों को समान रूप से गले लगाना शामिल है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में विशेष तौर पर बुद्ध पूर्णिमा मनाई जाती है जिसमे...

मेरी मां के लिए मेरे मन की बातें.......

मां तू ही आहट है,  तू नजाकत,तू ही हिमायत है मेरी। तू ही शराफत, तू शरारत,तू मोहब्बत है मेरी। तू ही जरुरत, तू गनीमत,तू शिकायत है मेरी। तू ही बनावट, तू सजावट,तू लिखावट है मेरी। तू ही रब की दया है,तू ही मेरी दुआ है। तू खुशियों की सदा है,तू दुखों की दवा है। तू लबों की हंसी है,तू आंखों की नमी हैं। तू प्यार की मूरत है,तू दिल की जरूरत है। तू ममता का सागर है,तू खुशियों की गागर है तू दुनिया में अनोखी है,तू सागर का मोती है। तू ज्ञान है मेरा, तू मान है मेरा। तूने सिखाया तो जीवन आसान है मेरा  मां तेरी दुआ से मैं खुश हूं। मां तेरी वजह से मैं खुश हूं। I love you maa........ Thanks for reading. ..
ये उन सभी मांओं के लिए, जो अपने बच्चों के लिए अपनी जान वार देने को तैयार है........ फूलों की खुशबू से चुराके खुशबू, मैं तुमको महकाऊं। मेरी जान के टुकड़े हो तुम, मैं तुमपे जान लुटाऊं। मैं मां हूं तुम्हारी,  मेरे बच्चे हो तुम, मैं जानती हूं , अभी छोटे थोड़े कच्चे हो तुम। पर तुम्हारी मां है तुम्हारे साथ , हर पल , हर कदम तुम्हारी रक्षा करूंगी मैं, जब तक है दम।तुम घबराना ना,  डर जाना ना,आंधियों से तूफानों से, मां की दुआएं तो रही है, बच्चों के साथ जमानो से। ना कभी मुश्किल में, होंसला हारो, मैं तुमको समझाऊं, मेरी जान के टुकड़े हो तुम, मैं तुमपे जान लुटाऊं।। Thanks for reading. ..

माँ के लिए एक सुन्दर कविता...

इस कविता के अंत में कोई कसम नहीं है क्योंकि ये कविता इतनी अच्छी है आप खुद शेयर किये बिना नहीं रह पाएंगे... लेती नहीं दवाई "माँ", जोड़े पाई-पाई "माँ"। दुःख थे पर्वत, राई "माँ", हारी नहीं लड़ाई "माँ"। इस दुनियां में सब मैले हैं, किस दुनियां से आई "माँ"। दुनिया के सब रिश्ते ठंडे, गरमागरम रजाई "माँ" । जब भी कोई रिश्ता उधड़े, करती है तुरपाई "माँ" । बाबू जी तनख़ा लाये बस, लेकिन बरक़त लाई "माँ"। बाबूजी थे सख्त मगर , माखन और मलाई "माँ"। बाबूजी के पाँव दबा कर सब तीरथ हो आई "माँ"। नाम सभी हैं गुड़ से मीठे, मां जी, मैया, माई, "माँ" । सभी साड़ियाँ छीज गई थीं, मगर नहीं कह पाई  "माँ" । घर में चूल्हे मत बाँटो रे, देती रही दुहाई "माँ"। बाबूजी बीमार पड़े जब, साथ-साथ मुरझाई "माँ" । रोती है लेकिन छुप-छुप कर, बड़े सब्र की जाई "माँ"। लड़त...

"मानवता ही श्रेष्ठ धर्म हैं"

*आजकल शादी-ब्याह का मौसम जोरों पर चल रहा हैं ।* कहते हैं शादी का लड्डू ऐसा हैं जो खाये वो पछताए जो न खाये वो भी पछताए ।कुछ बुद्धिजीवी और विद्वान सलाह देते हैं कि लड्डू खाकर ही पछताना चाहिए । लेकिन मेरी सलाह हैं कि शादी के लड्डू को पछताने वाला कतई भी नही बनाये इतनी काबिलियत खुद में तैयार कर ले कि जीवन-सफर ख़ुशी-ख़ुशी व्यतीत हो ।नींद से सुबह जैसे ही मेरी आँखे खुली पड़ोस से मधुर संगीत आवाज़ आया गीत चल रहा था - बाबुल की दुआये लेती जा जा तुझको .....** मुझे ख्याल आया कि इतना पुराना गीत, वह भी रुला देने वाला, इतने सालों बाद ? अब फिल्मों में नए गीत क्यों नही बनते ? बनते भी हैं तो बहुत ही कम ?**क्या अब फिल्मों में व्यवस्थित शादियाँ नही दिखाई जाती ?**आधुनिक युग में युवां-युवतियां शायद अब प्रेम-विवाह ज्यादा पसन्द करती हैं इसलिए माता-पिता भी शार्टकट पसन्द करते हुए विवाह कर देते हैं । इसलिए बिदाई के गीत नही के बराबर बन रहे हैं ।* *अंत में ! मैं तो चाहता हूँ कि बिदाई गीत भी बने , प्रेम- विवाह ( अंतर्जातीय विवाह ) भी हो ! प्रेमी-युगल को मनपसन्द हमसफ़र भी मिले लेकिन माँ-बाप की इज़ाजत से ।**और हर म...

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