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Showing posts with the label कविता संग्रह

रक्षा बंधन पर सुन्दर पंक्तियाँ

आहत न होना मैं दिल की खोल रहा हूँ । जय भीम दीदी मैं तेरा भाई बोल रहा हूँ । तेरा घर है तू सौ नहीं हज़ार बार आना । पर राखी बाँधने तू कल मत आना। ढोंग पाखन्ड से मुँह मोड़ चुका हूँ । ब्राह्मण वादी परम्पराओं से नाता तोड़ चुका हूँ । सरफरोसी जज्बा कौमी आदी हो गया है। तेरा भाई पक्का अम्बेडकर वादी हो गया है । तेरी रक्षा सुरक्षा से मुझे ऐतराज़ नही है । मगर मेरा फर्ज किसी राखी का मोहताज नही है। दुख दर्द पीर भारत की नारी का ले गये । बाबा साहब तो बिन राखी के सारे अधिकार दे गये। बिगड़ा हुआ कल था वो आज बना दिया है। बाबा साहब ने नारी को सरताज बना दिया है । मेरा साथ दे और तू भी अपना रुख मोड़ ले । दूज दिवाली होली मनाना तू भी छोड़ दे । नाराज न होना बहन मेरी परसों खुद लेने आऊंगा । प्रीत रीत और फर्ज अर्ज राखी बिन सभी निभाऊंगा। ( जय भीम ) Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

मेरे बाबा साहेब कहते हैं...

S.K. BHARTI सुन ऐ नादाँ, मुझे भी कोई दौलत की कमी नही होती, अगर मुझको तेरे सम्मान की कोई फिकर नही होती! गगन को चूम रहा होता, मेरा भी ऊंचा सा बंगला, लड़ाई जो तेरे हकों की, मैने कभी लड़ी नही होती। जिये होती मेरी भी औलादें, ऐश और आराम की जिंदगी, तुम्हारें बच्चो की खुशियों की मैंने, कहानी जो लिखी नही होती! छपी होती मेरी भी तस्वीरें, कागजों के इन टुकड़ो पर, तेरी खातिर जो मनुवादियों से, दुश्मनी मैने करी नही होती! जहां चाहत थी आज़ादी की, बही नदियों से खून की धारा, कद्र होती आजादी की तुझे, जो बैठे-बैठे न मिली होती! बड़ा अफसोस है कि मेरा, रह गया अधूरा इक सपना, जो तुम मेरी औलादों ने मिलकर, मेरे बताये रास्ते पे चले होते! बाबा साहेब जी ने अंत में बस यही कहा था-शिक्षित बनों, संगठित रहों, संघर्ष करों ! अफ़सोस ये है कि आज हम शिक्षित तो बन गए, लेकिन संगठित नही हो सकें !                                "जय भीम" Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

धरती की सुलगती छाती के बैचेन शरारे पूछते हैं ...

धरती की सुलगती छाती के, बैचेन शरारे पूछते हैं ... तुम लोग जिन्हे अपना न सके, वो खून के धारे पूछते हैं... सड़कों की जुबान चिल्लाती है सागर के किनारे पूछते हैं - ये किसका लहू है कौन मरा ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. ये  जलते हुए घर किसके हैं ये कटते हुए तन किसके है, तकसीम  के अंधे तूफ़ान में लुटते हुए गुलशन किसके हैं, बदबख्त फिजायें किसकी हैं बरबाद नशेमन किसके हैं, कुछ हम भी सुने, हमको भी सुना. ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. किस काम के हैं ये दीन धरम जो शर्म के दामन चाक करें, किस तरह के हैं ये देश भगत जो बसते घरों  को खाक करें, ये रूहें कैसी रूहें हैं जो धरती को नापाक करें, आँखे तो उठा, नज़रें तो मिला. ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. जिस राम के नाम पे खून बहे उस राम की इज्जत क्या होगी, जिस दीन के हाथों लाज लूटे उस दीन की कीमत क्या होगी, इन्सान की इस जिल्लत से परे शैतान की जिल्लत क्या होगी, ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. Santoshktn.blogger.com By ...

बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का, कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का।। एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है, अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है।। जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो, चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो।। हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो, गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो।। हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में, हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में।। हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं, डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं।। जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं, तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायें।। गेबागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे, अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की, परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था।। भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था, अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर।। कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर, अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर।। शोक...

आज भी मैं एक बच्चा हूँ

आज भी मैं एक बच्चा हूँ, आज भी मैं छुप के रोता हूँ, आज भी मैं कभी कभी डरता हूँ, आज भी वो लम्हे याद आते, सिकुड़ के सोना,बेबाक बोलना, किसी को सोचना,कभी कुछ न बोलना, वो यारो से मिलना,बेमतलब झगड़ना, वो खुद से बातें,वो बेपरवाह रातें, कल एक मेला था,आज एक भीड़ है, कल एक दौर था,आज एक दौड़ है, कल मैं मैं था,आज मैं बस नाम हूँ, लोग कहते हैं समझदार बनो, कुछ सोचो,कुछ समझो,बड़ी बात करो,कुछ ख्वाहिशें भी हैं,थोड़ा शोर भी है, कभी रुकना भी है,कहीं मज़िल भी है, पर आज भी एक मासूमियत है, पर आज भी एक शरारत है, Iशायद आज भी मैं एक बच्चा हूँ ........ Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

मेरी मां के लिए मेरे मन की बातें.......

मां तू ही आहट है,  तू नजाकत,तू ही हिमायत है मेरी। तू ही शराफत, तू शरारत,तू मोहब्बत है मेरी। तू ही जरुरत, तू गनीमत,तू शिकायत है मेरी। तू ही बनावट, तू सजावट,तू लिखावट है मेरी। तू ही रब की दया है,तू ही मेरी दुआ है। तू खुशियों की सदा है,तू दुखों की दवा है। तू लबों की हंसी है,तू आंखों की नमी हैं। तू प्यार की मूरत है,तू दिल की जरूरत है। तू ममता का सागर है,तू खुशियों की गागर है तू दुनिया में अनोखी है,तू सागर का मोती है। तू ज्ञान है मेरा, तू मान है मेरा। तूने सिखाया तो जीवन आसान है मेरा  मां तेरी दुआ से मैं खुश हूं। मां तेरी वजह से मैं खुश हूं। I love you maa........ Thanks for reading. ..

माँ के लिए एक सुन्दर कविता...

इस कविता के अंत में कोई कसम नहीं है क्योंकि ये कविता इतनी अच्छी है आप खुद शेयर किये बिना नहीं रह पाएंगे... लेती नहीं दवाई "माँ", जोड़े पाई-पाई "माँ"। दुःख थे पर्वत, राई "माँ", हारी नहीं लड़ाई "माँ"। इस दुनियां में सब मैले हैं, किस दुनियां से आई "माँ"। दुनिया के सब रिश्ते ठंडे, गरमागरम रजाई "माँ" । जब भी कोई रिश्ता उधड़े, करती है तुरपाई "माँ" । बाबू जी तनख़ा लाये बस, लेकिन बरक़त लाई "माँ"। बाबूजी थे सख्त मगर , माखन और मलाई "माँ"। बाबूजी के पाँव दबा कर सब तीरथ हो आई "माँ"। नाम सभी हैं गुड़ से मीठे, मां जी, मैया, माई, "माँ" । सभी साड़ियाँ छीज गई थीं, मगर नहीं कह पाई  "माँ" । घर में चूल्हे मत बाँटो रे, देती रही दुहाई "माँ"। बाबूजी बीमार पड़े जब, साथ-साथ मुरझाई "माँ" । रोती है लेकिन छुप-छुप कर, बड़े सब्र की जाई "माँ"। लड़त...

चलो इस दुनिया को हसीन बनाया जाय

चलो इस  दुनिया  को  कुछ  हसीन   बनाया जाय, किसी का दर्द बाँटकर होठों पे मुस्कान लाया जाय। कितनी  बर्बादी   है  खाने   की   इस   दुनिया   में, चलो  किसी  भूखे   को   भोजन   कराया   जाय। देखा  है  हमने   फ़टे-हाल   मेहनतकशों   को  भी, चलो  किसी की   चादर   में  पैब॔द   लगाया  जाय। हसीन   लगते   हैं   चाँद  और   सितारे   तो  बहुत, चलो इस  दुनिया  को भी कुछ हसीन बनाया जाय। बूँद-बूँद से ही भरता है घड़ा,ये करके दिखाया जाय, क्या होगा म॔दिरों में दान देकर,अस्पताल बनाया जाय। झुक  गई   है  जिनकी   कमर   बुढ़ापे  के  बोझ  से, चलो   उनके   साथ   दो   पल   ही   बिताया   जाय। ढहा  कर  नफ़रत  की  दीवारों  को   इस  दुनिया  से, चलो   इस  दुनिया  को   कुछ  हसीन  बनाया  जाय। Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

मेहनत से उठा हूँ, मेहनत का दर्द जानता हूँ

मेहनत से उठा हूँ, मेहनत का दर्द जानता हूँ, आसमाँ से ज्यादा जमीं की कद्र जानता हूँ। लचीला पेड़ था जो झेल गया आँधिया, मैं मगरूर दरख्तों का हश्र जानता हूँ। छोटे से बडा बनना आसाँ नहीं होता, जिन्दगी में कितना जरुरी है सब्र जानता हूँ। मेहनत बढ़ी तो किस्मत भी बढ़ चली, छालों में छिपी लकीरों का असर जानता हूँ। बेवक़्त, बेवजह, बेहिसाब मुस्कुरा देता हूँ, आधे दुश्मनो को तो यूँ ही हरा देता हूँ!! काफी कुछ पाया पर अपना कुछ नहीं माना, क्योंकि एक दिन मिट्टी में मिलना है ये जानता हूँ। Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

शरीर के रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता "माँ की इच्छा"

     महीने बीत जाते हैं ,      साल गुजर जाता है ,      वृद्धाश्रम की सीढ़ियों पर,      मैं तेरी राह देखती हूँ।      आँचल भीग जाता है,      मन खाली खाली रहता है।                                     तू कभी नहीं आता ,    तेरा मनीआर्डर आता है।      इस बार पैसे न भेज ,       तू खुद आ जा ,      बेटा मुझे अपने साथ ,      अपने 🏡घर लेकर जा।   तेरे पापा थे जब तक ,   समय ठीक रहा कटते ,   खुली आँखों से चले गए ,   तुझे याद करते करते।                अंत तक तुझको हर दिन ,                बढ़िया बेटा कहते थे ,   ...

इंसानियत...

*मस्जिद पे गिरता है* *मंदिर पे भी बरसता है..* *ए बादल बता तेरा मजहब कौनसा है........।।* *इमाम की तू प्यास बुझाए* *पुजारी की भी तृष्णा मिटाए*.. *ए पानी बता तेरा मजहब कोन सा है.... ।।* *मज़ारो की शान बढाता है* *मुर्तीयों को भी सजाता है..* *ए फूल बता तेरा मजहब कौनसा है........।।* *सारे जहाँ को रोशन करता है* *सृष्टी को उजाला देता है..* *ए सुरज बता तेरा मजहब कौनसा है.........।।* *मुस्लिम तूझ पे कब्र बनाता है* *हिंदू आखिर तूझ में ही विलीन होता है..* *ए मिट्टी बता तेरा मजहब कौनसा है......।।* *ऐ दोस्त मजहब से दूर हटकर, इंसान बनो* *क्योंकि "इंसानियत" का कोई मजहब नहीं होता... ।।* *नमो बुद्धाय* *जय भीम* sntshbhartiya@gmail.com

माँ को समर्पित चंद लाइनें...

एक गाँव में 10, साल का लड़का अपनी माँ के साथ रहता था। ( Santoshktn.blogspot.com By S K Bharti ) माँ ने सोचा कल मेरा बेटा मेले में जाएगा, उसके पास 10 रुपए तो हो, ये सोचकर माँ ने खेतो में काम करके शाम तक पैसे ले आई। बेटा स्कूल से आकर बोला खाना खाकर जल्दी सो जाता हूँ, कल मेले में जाना है। सुबह माँ से बोला - मैं नहाने जाता हूँ,नाश्ता तैयार रखना, माँ ने रोटी बनाई, दूध अभी चूल्हे पर था..! माँ ने देखा बरतन पकडने के लिए कुछ नहीं है, उसने गर्म पतीला हाथ से उठा लिया, माँ का हाथ जल गया। बेटे ने गर्दन झुकाकर दूध रोटी खाई और मेले में चला गया। शाम को घर आया,तो माँ ने पूछा - मेले में क्या देखा,10 रुपए का कुछ खाया कि नहीं..!! बेटा बोला - माँ आँखें बंद कर,तेरे लिए कुछ लाया हूँ। माँ ने आँखें बंद की,तो बेटे ने उसके हाथ में गर्म बरतन उठाने के लिए लाई सांडसी रख दी। अब माँ तेरे हाथ नहीं जलेंगे। माँ की आँखों से आँसू बहने लगे। दोस्तों, माँ के चरणों मे स्वर्ग है, कभी उसे दुखी मत करो..! सब कुछ मिल जाता है, पर ...

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