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एक भैंस की आत्मव्यथा...

बोली भैंस गाय से बहना, मुझको भी कुछ सिखलाओ। क्यों माता माता बोलें नर तुमको, मुझको भी बतलाओ।। जाति धर्म में पड़कर , जो निशदिन लड़ते रहते हैं। निज मां का सम्मान नहीं,पर तुमको माता कहते हैं।। खेल कौन खेला है तुमने, वशीभूत किया है कैसे। मदिरा के शौकीन पुरुषो ने, तेरा मूत्र पिया है कैसे।। मेरी समझ से बाहर है सब, कुछ तो मुझको बतलाओ। कौन सियासत खेली तुमने, आज मुझे भी समझाओ।। जो गुण तुझमें वो गुण मुझमें, फिर क्यों मेरा सम्मान नहीं। दूध,दही,घी,चमड़ा सबकुछ, दिया मैने क्या सामान नहीं।। तेरी हरदम पूजा होती, फल फूल चढ़ाए जाते हैं। वेद पुराण आदि में, तेरे ही किस्से क्यों पाये जाते हैं।। तेरे मरने पर भी शहरों में, क्यों कोहराम मचाते हैं। मेरे मरने पर तो मुझको चील और कौवे ही खाते हैं।। सारी बुद्धि खोल दी मैंने पर समझ नहीं कुछ आया है। दूध दिया तुझसे ज्यादा, फिर भी आगे तुझको पाया है।। #- बोली गाय प्रेम से , फिर सुन लो बहना भैंस कुमारी। तुमसे कैसी राजनीति, तुम तो हो प्रिय बहन हमारी।। नवजात बच्चियों को जो पैदा होते ही मार गिराते हैं। दहेज की खातिर गृह लक्ष्मी को जिंदा...

डॉ० एपीजे अब्दुल कलाम साहब की चन्द लाईनें...

डॉ० एपीजे अब्दुल कलाम की चन्द लाईनें जो हमे जीवन में हमेशा याद रखनी चाहिए। और हो सके तो उसे अमल भी करना चाहिये। 1. जिदंगी मे कभी भी किसी को       बेकार मत समझना,क्योक़ि         बंद पडी घडी भी दिन में           दो बार सही समय बताती है। 2. किसी की बुराई तलाश करने       वाले इंसान की मिसाल उस        मक्खी की तरह है जो सारे          खूबसूरत जिस्म को छोडकर            केवल जख्म पर ही बैठती है। 3. टूट जाता है गरीबी मे       वो रिश्ता जो खास होता है,         हजारो यार बनते है           जब पैसा पास होता है। 4. मुस्करा कर देखो तो       सारा जहाॅ रंगीन है,         वर्ना भीगी पलको           से तो आईना भी              धुधंला नजर आता है। 5..जल्द मिलने वाली चीजे       ज्यादा दिन तक नही चलती,         और जो चीजे ज्यादा            दिन तक चलती है              वो जल्दी नही मिलती। 6. बुरे दिनो का एक       अच्छा फायदा          अच्छे-अच्छे दोस्त             परखे जाते है। 7. बीमारी खरगोश की तरह       आती है और कछुए की तरह         जाती है;          ...

मेरे बाबा साहेब कहते हैं...

S.K. BHARTI सुन ऐ नादाँ, मुझे भी कोई दौलत की कमी नही होती, अगर मुझको तेरे सम्मान की कोई फिकर नही होती! गगन को चूम रहा होता, मेरा भी ऊंचा सा बंगला, लड़ाई जो तेरे हकों की, मैने कभी लड़ी नही होती। जिये होती मेरी भी औलादें, ऐश और आराम की जिंदगी, तुम्हारें बच्चो की खुशियों की मैंने, कहानी जो लिखी नही होती! छपी होती मेरी भी तस्वीरें, कागजों के इन टुकड़ो पर, तेरी खातिर जो मनुवादियों से, दुश्मनी मैने करी नही होती! जहां चाहत थी आज़ादी की, बही नदियों से खून की धारा, कद्र होती आजादी की तुझे, जो बैठे-बैठे न मिली होती! बड़ा अफसोस है कि मेरा, रह गया अधूरा इक सपना, जो तुम मेरी औलादों ने मिलकर, मेरे बताये रास्ते पे चले होते! बाबा साहेब जी ने अंत में बस यही कहा था-शिक्षित बनों, संगठित रहों, संघर्ष करों ! अफ़सोस ये है कि आज हम शिक्षित तो बन गए, लेकिन संगठित नही हो सकें !                                "जय भीम" Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

धरती की सुलगती छाती के बैचेन शरारे पूछते हैं ...

धरती की सुलगती छाती के, बैचेन शरारे पूछते हैं ... तुम लोग जिन्हे अपना न सके, वो खून के धारे पूछते हैं... सड़कों की जुबान चिल्लाती है सागर के किनारे पूछते हैं - ये किसका लहू है कौन मरा ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. ये  जलते हुए घर किसके हैं ये कटते हुए तन किसके है, तकसीम  के अंधे तूफ़ान में लुटते हुए गुलशन किसके हैं, बदबख्त फिजायें किसकी हैं बरबाद नशेमन किसके हैं, कुछ हम भी सुने, हमको भी सुना. ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. किस काम के हैं ये दीन धरम जो शर्म के दामन चाक करें, किस तरह के हैं ये देश भगत जो बसते घरों  को खाक करें, ये रूहें कैसी रूहें हैं जो धरती को नापाक करें, आँखे तो उठा, नज़रें तो मिला. ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. जिस राम के नाम पे खून बहे उस राम की इज्जत क्या होगी, जिस दीन के हाथों लाज लूटे उस दीन की कीमत क्या होगी, इन्सान की इस जिल्लत से परे शैतान की जिल्लत क्या होगी, ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा. Santoshktn.blogger.com By ...

अंग्रेजों को बुरा क्यों कहते हो साहेब❓

नासमझ लोग अंग्रेजों को बहुत गलत बताते हैं और अंग्रेजों को बहुत बुरा भला कहते हैं। लेकिन *obc* समाज में जन्मे *महान क्रन्तिकारी समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फूले* ने कहा था कि *अंग्रेज शूद्र/अतिशूद्र के लिए भगवान बनकर आये है.* अर्थात sc/st/obc/minority के *असली दुश्मन* अंग्रेज नहीं *ब्राह्मण हैं* जिन्होंने इनको शिक्षा सत्ता सम्पत्ति सम्मान से दूर रखकर *हजारो साल से शोषण किया है |* अतः शुद्रो को ब्राह्मणों की धार्मिक गुलामी से मुक्ति चाहिए तो *ब्राह्मणों द्वारा थोपे गए मान्यता परम्परा और संस्कारो को नकारना होगा ।* मैं कुछ जानकारी देना चाहता हूं जरूर पढें कि *अंग्रेजों ने कितने पाखंडों पर रोक लगाने में कामयाबी पायी...* इसे पढें - १) *रथयात्रा* :- जगन्नाथ में हर तीसरेवर्ष यह यात्रा निकाली जाती है जिसमें स्वर्ग पाने के चक्कर में रथ के पहिये के नीचे आकर सैकडों लोगों की जान चली जाती थी, कानून बनाकर बंद की । २) *काशीकरबट* :- काशी धाम में ईश्वर प्राप्ति हेतु विश्वेश्वर के मंदिर के पास कुए में कूद कर जान देते थे बंद कराई गयी । ३) *चरक पूजा* :- काली के मोक्षाभिलाषी उपासक की रीड की हड्...

बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का, कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का।। एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है, अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है।। जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो, चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो।। हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो, गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो।। हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में, हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में।। हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं, डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं।। जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं, तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायें।। गेबागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे, अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की, परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था।। भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था, अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर।। कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर, अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर।। शोक...

आज भी मैं एक बच्चा हूँ

आज भी मैं एक बच्चा हूँ, आज भी मैं छुप के रोता हूँ, आज भी मैं कभी कभी डरता हूँ, आज भी वो लम्हे याद आते, सिकुड़ के सोना,बेबाक बोलना, किसी को सोचना,कभी कुछ न बोलना, वो यारो से मिलना,बेमतलब झगड़ना, वो खुद से बातें,वो बेपरवाह रातें, कल एक मेला था,आज एक भीड़ है, कल एक दौर था,आज एक दौड़ है, कल मैं मैं था,आज मैं बस नाम हूँ, लोग कहते हैं समझदार बनो, कुछ सोचो,कुछ समझो,बड़ी बात करो,कुछ ख्वाहिशें भी हैं,थोड़ा शोर भी है, कभी रुकना भी है,कहीं मज़िल भी है, पर आज भी एक मासूमियत है, पर आज भी एक शरारत है, Iशायद आज भी मैं एक बच्चा हूँ ........ Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

*बुद्ध पूर्णिमा पर्व और सयुक्त राष्ट्र संघ*

संयुक्त राष्ट्र संघ का संदेश है कि समाज को बांटने पर केंद्रित नफरत संबंधी बयानों और हिंसक संघर्षों के वर्तमान दौर में बुद्ध की शिक्षा करुणा और अहिंसा अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बड़ी चुनौतियों से निबटने में मदद करती है। संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि भगवान बुद्ध की शिक्षा का प्रबल आधार   'विवेक" है जिससे अपने परिवार के साथ समाज को जोड़ने का सौभाग्य मिलता है यह सामूहिक जीवनपार्जन नीति है,।अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय चुनौतियों को  निबटने में बुद्ध की शिक्षा जितनी प्राचीन काल में प्रासंगीक थी, आज भी उत-निहि प्रासंगिक है।  बुद्ध कि शिक्षा सभी जीवों के लिए प्यार और करुणा का पाठ पढ़ाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने संदेश में आगे यह भी कहा है कि समस्याओं का समाधान "बौद्ध विवेक एक प्रबल स्त्रोत है" जो  'आंतरराष्ट्रीय वैशाख बुद्ध पूर्णिमा दिवस' है और यह दिवस सभी लोगों के प्रति करूणा अपनाने की याद दिलाता है जिसमें विभिन्न वर्गो में कट्टरता अस्वीकार करके सभी लोगों को समान रूप से गले लगाना शामिल है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में विशेष तौर पर बुद्ध पूर्णिमा मनाई जाती है जिसमे...

मेरी मां के लिए मेरे मन की बातें.......

मां तू ही आहट है,  तू नजाकत,तू ही हिमायत है मेरी। तू ही शराफत, तू शरारत,तू मोहब्बत है मेरी। तू ही जरुरत, तू गनीमत,तू शिकायत है मेरी। तू ही बनावट, तू सजावट,तू लिखावट है मेरी। तू ही रब की दया है,तू ही मेरी दुआ है। तू खुशियों की सदा है,तू दुखों की दवा है। तू लबों की हंसी है,तू आंखों की नमी हैं। तू प्यार की मूरत है,तू दिल की जरूरत है। तू ममता का सागर है,तू खुशियों की गागर है तू दुनिया में अनोखी है,तू सागर का मोती है। तू ज्ञान है मेरा, तू मान है मेरा। तूने सिखाया तो जीवन आसान है मेरा  मां तेरी दुआ से मैं खुश हूं। मां तेरी वजह से मैं खुश हूं। I love you maa........ Thanks for reading. ..
ये उन सभी मांओं के लिए, जो अपने बच्चों के लिए अपनी जान वार देने को तैयार है........ फूलों की खुशबू से चुराके खुशबू, मैं तुमको महकाऊं। मेरी जान के टुकड़े हो तुम, मैं तुमपे जान लुटाऊं। मैं मां हूं तुम्हारी,  मेरे बच्चे हो तुम, मैं जानती हूं , अभी छोटे थोड़े कच्चे हो तुम। पर तुम्हारी मां है तुम्हारे साथ , हर पल , हर कदम तुम्हारी रक्षा करूंगी मैं, जब तक है दम।तुम घबराना ना,  डर जाना ना,आंधियों से तूफानों से, मां की दुआएं तो रही है, बच्चों के साथ जमानो से। ना कभी मुश्किल में, होंसला हारो, मैं तुमको समझाऊं, मेरी जान के टुकड़े हो तुम, मैं तुमपे जान लुटाऊं।। Thanks for reading. ..

माँ के लिए एक सुन्दर कविता...

इस कविता के अंत में कोई कसम नहीं है क्योंकि ये कविता इतनी अच्छी है आप खुद शेयर किये बिना नहीं रह पाएंगे... लेती नहीं दवाई "माँ", जोड़े पाई-पाई "माँ"। दुःख थे पर्वत, राई "माँ", हारी नहीं लड़ाई "माँ"। इस दुनियां में सब मैले हैं, किस दुनियां से आई "माँ"। दुनिया के सब रिश्ते ठंडे, गरमागरम रजाई "माँ" । जब भी कोई रिश्ता उधड़े, करती है तुरपाई "माँ" । बाबू जी तनख़ा लाये बस, लेकिन बरक़त लाई "माँ"। बाबूजी थे सख्त मगर , माखन और मलाई "माँ"। बाबूजी के पाँव दबा कर सब तीरथ हो आई "माँ"। नाम सभी हैं गुड़ से मीठे, मां जी, मैया, माई, "माँ" । सभी साड़ियाँ छीज गई थीं, मगर नहीं कह पाई  "माँ" । घर में चूल्हे मत बाँटो रे, देती रही दुहाई "माँ"। बाबूजी बीमार पड़े जब, साथ-साथ मुरझाई "माँ" । रोती है लेकिन छुप-छुप कर, बड़े सब्र की जाई "माँ"। लड़त...

"मानवता ही श्रेष्ठ धर्म हैं"

*आजकल शादी-ब्याह का मौसम जोरों पर चल रहा हैं ।* कहते हैं शादी का लड्डू ऐसा हैं जो खाये वो पछताए जो न खाये वो भी पछताए ।कुछ बुद्धिजीवी और विद्वान सलाह देते हैं कि लड्डू खाकर ही पछताना चाहिए । लेकिन मेरी सलाह हैं कि शादी के लड्डू को पछताने वाला कतई भी नही बनाये इतनी काबिलियत खुद में तैयार कर ले कि जीवन-सफर ख़ुशी-ख़ुशी व्यतीत हो ।नींद से सुबह जैसे ही मेरी आँखे खुली पड़ोस से मधुर संगीत आवाज़ आया गीत चल रहा था - बाबुल की दुआये लेती जा जा तुझको .....** मुझे ख्याल आया कि इतना पुराना गीत, वह भी रुला देने वाला, इतने सालों बाद ? अब फिल्मों में नए गीत क्यों नही बनते ? बनते भी हैं तो बहुत ही कम ?**क्या अब फिल्मों में व्यवस्थित शादियाँ नही दिखाई जाती ?**आधुनिक युग में युवां-युवतियां शायद अब प्रेम-विवाह ज्यादा पसन्द करती हैं इसलिए माता-पिता भी शार्टकट पसन्द करते हुए विवाह कर देते हैं । इसलिए बिदाई के गीत नही के बराबर बन रहे हैं ।* *अंत में ! मैं तो चाहता हूँ कि बिदाई गीत भी बने , प्रेम- विवाह ( अंतर्जातीय विवाह ) भी हो ! प्रेमी-युगल को मनपसन्द हमसफ़र भी मिले लेकिन माँ-बाप की इज़ाजत से ।**और हर म...

14 अप्रैल ज्ञान दिवस पर विशेष

14 अप्रैल ज्ञान  दिवस पर विशेष विश्वपुरूष बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर जी के बारे में कुछ अनमोल रिश्ते Fact 1: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अपने माता-पिता की चौदहवीं और आखिरी संतान थे। Fact 2: डॉ. अंबेडकर के पूर्वज काफी समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी में एम्प्लोयेड थे और उनके पिता ब्रिटिश इंडियन आर्मी में Mhow cantonment में तैनात थे। Fact 3: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का मूल या ओरिजिनल सरनेम अंबावडेकर था। लेकिन उनके शिक्षक, महादेव आंबेडकर, जो उन्हें बहुत मानते थे, ने स्कूल रिकार्ड्स में उनका नाम अंबावडेकर से आंबेडकर कर दिया। Fact 4: बाबासाहेब मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में दो साल तक प्रिंसिपल पद पर कार्यरत रहे। Fact 5: बाबासाहेब डॉ. बी. आर आंबेडकर भारतीय संविधान की धारा 370, जो जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देता है के खिलाफ थे। Fact 6: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर विदेश जाकर अर्थशास्त्र डॉक्टरेट (PhD) की डिग्री हासिल करने वाले पहले भारतीय थे। Fact 7: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अपने समय के सबसे जादा पढे-लिखे नेता और भारत के सबसे अधिक बुद्धिमान व्यक्ति थे। Fact 8: डॉ. आंबेडकर ही ए...

चलो इस दुनिया को हसीन बनाया जाय

चलो इस  दुनिया  को  कुछ  हसीन   बनाया जाय, किसी का दर्द बाँटकर होठों पे मुस्कान लाया जाय। कितनी  बर्बादी   है  खाने   की   इस   दुनिया   में, चलो  किसी  भूखे   को   भोजन   कराया   जाय। देखा  है  हमने   फ़टे-हाल   मेहनतकशों   को  भी, चलो  किसी की   चादर   में  पैब॔द   लगाया  जाय। हसीन   लगते   हैं   चाँद  और   सितारे   तो  बहुत, चलो इस  दुनिया  को भी कुछ हसीन बनाया जाय। बूँद-बूँद से ही भरता है घड़ा,ये करके दिखाया जाय, क्या होगा म॔दिरों में दान देकर,अस्पताल बनाया जाय। झुक  गई   है  जिनकी   कमर   बुढ़ापे  के  बोझ  से, चलो   उनके   साथ   दो   पल   ही   बिताया   जाय। ढहा  कर  नफ़रत  की  दीवारों  को   इस  दुनिया  से, चलो   इस  दुनिया  को   कुछ  हसीन  बनाया  जाय। Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

मेहनत से उठा हूँ, मेहनत का दर्द जानता हूँ

मेहनत से उठा हूँ, मेहनत का दर्द जानता हूँ, आसमाँ से ज्यादा जमीं की कद्र जानता हूँ। लचीला पेड़ था जो झेल गया आँधिया, मैं मगरूर दरख्तों का हश्र जानता हूँ। छोटे से बडा बनना आसाँ नहीं होता, जिन्दगी में कितना जरुरी है सब्र जानता हूँ। मेहनत बढ़ी तो किस्मत भी बढ़ चली, छालों में छिपी लकीरों का असर जानता हूँ। बेवक़्त, बेवजह, बेहिसाब मुस्कुरा देता हूँ, आधे दुश्मनो को तो यूँ ही हरा देता हूँ!! काफी कुछ पाया पर अपना कुछ नहीं माना, क्योंकि एक दिन मिट्टी में मिलना है ये जानता हूँ। Santoshktn.blogger.com By SK BHARTI

शरीर के रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता "माँ की इच्छा"

     महीने बीत जाते हैं ,      साल गुजर जाता है ,      वृद्धाश्रम की सीढ़ियों पर,      मैं तेरी राह देखती हूँ।      आँचल भीग जाता है,      मन खाली खाली रहता है।                                     तू कभी नहीं आता ,    तेरा मनीआर्डर आता है।      इस बार पैसे न भेज ,       तू खुद आ जा ,      बेटा मुझे अपने साथ ,      अपने 🏡घर लेकर जा।   तेरे पापा थे जब तक ,   समय ठीक रहा कटते ,   खुली आँखों से चले गए ,   तुझे याद करते करते।                अंत तक तुझको हर दिन ,                बढ़िया बेटा कहते थे ,   ...

इंसानियत...

*मस्जिद पे गिरता है* *मंदिर पे भी बरसता है..* *ए बादल बता तेरा मजहब कौनसा है........।।* *इमाम की तू प्यास बुझाए* *पुजारी की भी तृष्णा मिटाए*.. *ए पानी बता तेरा मजहब कोन सा है.... ।।* *मज़ारो की शान बढाता है* *मुर्तीयों को भी सजाता है..* *ए फूल बता तेरा मजहब कौनसा है........।।* *सारे जहाँ को रोशन करता है* *सृष्टी को उजाला देता है..* *ए सुरज बता तेरा मजहब कौनसा है.........।।* *मुस्लिम तूझ पे कब्र बनाता है* *हिंदू आखिर तूझ में ही विलीन होता है..* *ए मिट्टी बता तेरा मजहब कौनसा है......।।* *ऐ दोस्त मजहब से दूर हटकर, इंसान बनो* *क्योंकि "इंसानियत" का कोई मजहब नहीं होता... ।।* *नमो बुद्धाय* *जय भीम* sntshbhartiya@gmail.com

एक कड़वा सच...

वो रस्सी आज भी  संग्रहालय में है जिससे गांधीजी बकरी बांधा करते थे, किन्तु वो रस्सी कहां है जिस पे भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु हँसते हुए झूल गए थे। " हालात-ए-मुल्क देख के रोया न गया... कोशिश तो की पर मुंह ढक के सोया न गया" देश मेरा क्या बाजार हो गया है ... पकड़ता हु तिरंगा  तो लोग पूछते है कितने का है... जाने कितने झूले थे फाँसी पर, कितनो ने गोली खाई थी.... क्यों झूठ बोलते हो साहब, कि चरखे से आजादी आई थी...                      "जय भीम नमो बुद्धाय"

हमारी अधूरी आजादी...

SK BHARTI भारत को स्वतंत्र हुए 69 साल बीत गए. कितने जोश और जुनून के साथ हर साल आज़ादी का जश्न मनाया जाता है, पर खुद की आज़ादी का जश्न कब मना पाएंगे देशवासी, आज भी एक बड़ा सवाल हमारे सामने है कि क्या सच में हम आज़ाद हैं? हमारा देश तो विदेशी हुकूमत से आज़ाद हो गया पर हमारे देश के लोगों की सोच अभी तक आज़ाद नहीं हो सकी है। अगर हमें बताया जाए कि 70 साल के स्व-शासन के बाद भी अमीर-गरीब के बीच बढ़ती असमानता में हम दुनिया के 188 देशों में 150वें नंबर पर हैं और यह खाई लगातार बढ़ती जा रही है, गलती किसकी है? हम हर पांच साल में सरकार चुनते हैं, लेकिन अपनी समस्याएं नहीं समझ पाते। ( Santoshktn.blogspot.com by SK BHARTI) अभी तक महफूज़ है एक धुंधली सी परिभाषा गणतंत्र यानी एक ऐसी व्यवस्था जहाँ सर्वोपरि होती है जनता जहाँ सारे फ़ैसले लेती है जनता और उनको लागू भी करती है जनता बचपन की दहलीज़ लांघते ही दुनियादार लोगों ने बताई एक नयी परिभाषा चूँकि जनता है अभी तक नादान नहीं आता उसको राजकाज चलाने का काम इसलिये फ़ैसले लेते हैं।जनता के नुमाइंदे जनता के नाम और वो उनको लागू करते हैं। जनता के नामवक़्त ...

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